एम्स भोपाल के बाल रोग विभाग ने आठवें वार्षिक ज़ोनल पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी (बच्चों के गुर्दा रोगों का विज्ञान) कॉन्क्लेव (एपीएनसी 2026) का आयोजन किया। पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी यानी। कई राज्यों से आए कुल 128 प्रतिनिधि और संकाय सदस्य इसमें शामिल हुए। कॉन्क्लेव का मुख्य उद्देश्य बच्चों की डायलिसिस (मशीन या अन्य विधि से रक्त की सफाई) और गंभीर गुर्दा रोगों की देखभाल का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण देना था। स्नातकोत्तर प्रशिक्षुओं और वरिष्ठ रेजिडेंट चिकित्सकों ने गुर्दा विफलता से जूझते बच्चों के उपचार में प्रयुक्त हर विधि का अभ्यास किया।
कॉन्क्लेव का उद्घाटन एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ) नरेन्द्र कोतवाल (रि) ने किया। उन्होंने देश में उप-विशेषज्ञताओं के बढ़ते महत्व पर बात की और कहा कि स्नातकोत्तर प्रशिक्षुओं और वरिष्ठ रेजिडेंट चिकित्सकों को प्रशिक्षित करने के लिए ऐसे कार्यक्रम नियमित रूप से होने चाहिए। शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए उन्होंने विभाग को बधाई दी।
एम्स नई दिल्ली के एमेरिटस प्रोफेसर डॉ अरविंद बग्गा ने भारत में बाल गुर्दा रोग विज्ञान के एक उप-विशेषज्ञता के रूप में विकास पर अपने विचार रखे। डॉ बग्गा ने भारतीय बच्चों में हीमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम (एचयूएस) पर व्यापक कार्य किया है। यह ऐसी बीमारी है, जिसमें रक्त कोशिकाएं टूटने से गुर्दे गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। उन्होंने बताया कि एचयूएस के उपचार में काम आने वाली एकुलिजुमैब थेरेपी पहले केवल पश्चिमी देशों में उपलब्ध थी, लेकिन अब राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (एनपीआरडी) कार्यक्रम के तहत भारत में भी उपलब्ध है।
राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (एनपीआरडी) के तहत एम्स भोपाल में आनुवंशिकी विभाग के माध्यम से एकुलिजुमैब निशुल्क उपलब्ध है। यह दवा हीमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम जैसे दुर्लभ और जानलेवा गुर्दा रोग के उपचार में दी जाती है और बहुत महंगी है। कॉन्क्लेव में एम्स भोपाल का एक सफल मामला प्रस्तुत किया गया।
हाल ही में बच्चे को एकुलिजुमैब शुरू की गई, वह अब रोगमुक्ति की स्थिति में है और उसे प्लाज्मा एक्सचेंज (रक्त के तरल हिस्से को बदलने की प्रक्रिया) की आवश्यकता नहीं पड़ी। एनपीआरडी कार्यक्रम के तहत मध्यप्रदेश में बच्चों में एकुलिजुमैब का यह पहला उपयोग है। पिछले कुछ वर्षों में एम्स भोपाल में एचयूएस से पीड़ित 30 बच्चों का उपचार किया गया है और उनमें से 85 प्रतिशत स्वस्थ हैं।
सिस्टिनोसिस (एक अन्य दुर्लभ आनुवंशिक रोग, जो गुर्दों को नुकसान पहुंचाता है) से पीड़ित बच्चों को भी इस कार्यक्रम के तहत दवाएं निशुल्क मिल रही हैं।
बाल रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ शिखा मलिक ने बताया कि संस्थान में समर्पित बाल डायलिसिस यूनिट संचालित है, जो मध्यप्रदेश में अपनी तरह की पहली है। यहां प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के बच्चों को सभी प्रकार की डायलिसिस सुविधा दी जाती है। बीते एक वर्ष में 65 बच्चों की हीमोडायलिसिस (मशीन द्वारा रक्त की सफाई) की गई और 1,500 से अधिक हीमोडायलिसिस सत्र हुए, जिनसे कई बच्चों की जान बची।



