उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में लखनऊ के निकट स्थित सिधौली में केरल से आए एक मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने लखनऊवी चिकनकारी की समृद्ध एवं सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव किया। प्रतिनिधिमंडल ने स्थानीय कारीगरों से मुलाकात कर चिकनकारी की बारीक कढ़ाई, पारंपरिक तकनीकों और इससे जुड़े ग्रामीण आजीविका के अवसरों की जानकारी प्राप्त की।

सिधौली क्षेत्र लखनऊवी चिकनकारी के प्रमुख ग्रामीण हस्तशिल्प केंद्रों में से एक है। यहां की चिकनकारी न केवल भारतीय कला एवं संस्कृति की समृद्ध विरासत को संरक्षित कर रही है, बल्कि विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम भी बनी हुई है।

चिकनकारी अपनी बारीक और आकर्षक हाथ की कढ़ाई के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस कला की जड़ें मुगलकालीन परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं। सूती, मलमल, जॉर्जेट और ऑर्गेंजा जैसे महीन कपड़ों पर सुई और धागे से बेहद सावधानीपूर्वक की जाने वाली कढ़ाई इसकी प्रमुख विशेषता है।

केरल के मीडिया प्रतिनिधिमंडल के इस दौरे के दौरान स्थानीय कारीगरों ने बखिया, जाली, टेपची, मुरी और पश्नी जैसी पारंपरिक कढ़ाई तकनीकों का प्रदर्शन किया। प्रतिनिधिमंडल ने यह भी जाना कि किस प्रकार यह कला घर-आधारित कार्य के माध्यम से बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार और आय का अवसर उपलब्ध करा रही है।

चिकनकारी से तैयार किए जाने वाले कुर्ते, साड़ियां, दुपट्टे और कुर्तियां लखनऊ के प्रमुख बाजारों के माध्यम से देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचते हैं। इस प्रकार सिधौली और आसपास के क्षेत्रों की यह पारंपरिक कला स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में योगदान दे रही है।